भारतीय संस्कृति की आत्मा केवल इतिहास में नहीं, बल्कि उन अमर कथाओं में बसती है जो युगों
से जनमानस को प्रेरित करती आई हैं। इन्हीं दिव्य कथाओं में एक तेजस्वी नाम है - माता मोरवी।
वे केवल दैत्यराज मूर की पुत्री या वीर बर्बरीक (श्याम बाबा) की माता ही नहीं थीं बल्कि वे
शक्ति, ज्ञान, त्याग और तपस्या का अद्वितीय संगम थीं। उनका जीवन एक ऐसी साधना थी जिसमें
प्रतिशोध की ज्वाला ज्ञान में परिवर्तित होती है, जो मातृत्व धर्म की वेदी पर सर्वोच्च
बलिदान बन जाता है।
कामरूप की तांत्रिक भूमि में जन्मी माता मोरवी ने अस्त्र और शस्त्र दोनों में सिद्धि
प्राप्त की, परंतु श्रीकृष्ण के विराट रूप के दर्शन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। एक योद्धा
का अहंकार साधना में रूपांतरित हुआ, और उसी साधना ने उन्हें उस महान भूमिका के लिए तैयार
किया, जहाँ वे इतिहास के सबसे अद्वितीय बलिदान की जननी बनने वाली थीं।
उन्होंने अपने पुत्र बर्बरीक को 5 वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु तक ना केवल युद्धकला सिखाई, बल्कि
यह भी सिखाया कि शक्ति का सर्वोच्च रूप संयम है और वीरता का परम स्वरूप त्याग। ‘हारे का सहारा’ बनने
का उनका दिया हुआ वचन आज भी श्रद्धा का आधार है।
पुत्र के शीशदान के पश्चात्- माता मोरवी ने अपने पुत्र की जन्मभूमि जो कि काम्यक वन अरावली की
लख्खीपुरा पहाड़ियों में था, को ही अपनी तपोभूमि बनाया। उनकी मौन साधना आज भी उस क्षेत्र की हवाओं
में अनुभूत होती है।
मान्यता है कि महाभारत के उपरांत माता ने श्रीकृष्ण और जगदंबा (कामाख्या) के समक्ष एक
दिव्य संकल्प व्यक्त किया - कि वे कलियुग में तपोभूमि क्षेत्र लख्खीपुरा (सीकर) में पुनः अवतरित
होकर अपने पुत्र बर्बरीक के कल्याणकारी कार्यों को बल प्रदान करेंगी।
उन्होंने वचन दिया कि वे बर्बरीक (श्याम बाबा) सहित सीकर जिले की अपनी तपोभूमि एवं
बर्बरीक की जन्मस्थली काम्यक वन लख्खीपुरा की पावन भूमि पर
विराजमान होकर भक्तों का कल्याण करेंगी, धर्म और आस्था की ज्योति को प्रज्जवलित रखेंगी तथा संतानों
को सत्य और साहस के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देंगी। इसी कारण कलियुग में माता मोरवी की महत्ता
निरंतर बढ़ती रही है,
और माता मोरवी का स्मरण आज श्रद्धालुओं के लिए आश्रय और आशीर्वाद का स्त्रोत माना जाता
है।
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